Радим Навьян

Мне приходится много общаться. На чужих площадках. По чужим правилам. И, имея принципиально иной взгляд на всё происходящее, я неизбежно вызываю поток раздражения на себя. Это вынудило меня разбираться с […]

– यस्मात् अकर्ता पुरुषः, तद् कथम् अध्यवसायं करोति– धर्मं करिष्यामि, अधर्मं न करिष्यामि इति? अतः, कर्ता भवति– न च कर्ता पुरुषः, एवम् उभयथा दोषः स्यात् इति। – Коль скоро Душа […]

अतः च– И поэтому… कारणम् अस्ति अव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणतः समुदयात् च। परिणामतः सलिलवत् प्रति–प्रति–गुण–आश्रय–विशेषात्॥ अन्वयः– अव्यक्तं कारणम् अस्ति (यतः) त्रिगुणतः समुदयात् च सलिलवत् प्रति–प्रति–गुण–आश्रयय–विशेषात् परिणामतः (महात्–आदि) प्रवर्तते। अव्यक्तं प्रख्यातं कारणम् […]

त्रैतुण्यात् अविवेकि–आदिः व्यक्ते सिद्धः। तद्–विपर्यय–अभावात्, एवं कारण–गुण–आत्मकत्वात् कार्यस्य, अव्यक्तम् अपि सिद्धम्– इति एतत् मिथ्या; लोके यत् न उपलभ्यते, तत् नास्ति– (इति न वाच्यम्, सतः अपि पाषाण–गन्ध–आदेः अनुपलम्भात्।) एवं प्रधानम् अपि […]

Перевод отрывка из комментария Гаудапады на девятую карику Ищваракришны можно посмотреть здесь. Это полезно, потому что именно коренной текст ниже мы подвергнем пристальному рассмотрению. Слово कारणम् изводится от каузатива к […]

यत् इदं महत्–आदि–कार्यं, तत् किं प्रधाने सत् उत अहोस्विद् असत्? – आचार्य–विप्रतिपत्तेः अयं संशयः। Вследствие различия мнений наставников имеет место следующая неразрешённость: следствие в виде Великого и прочих, оно в […]

अथ व्यक्त–अव्यक्त–ज्ञानां कः विशेषः, इति उच्यते– Теперь говорится о том, какая разница между Явным, Скрытым и Знатоком: मूल–प्रकृतिः= अविकृतिः, महत्–आद्याः प्रकृति–विकृतयः सप्त। षोडशकः तु विकारः; न प्रकृतिः, न विकृतिः= पुरुषः॥ […]

यदि दृष्टात् अन्यत्र जिज्ञासा कार्या, ततः अपि न एव। यतः आनुश्रविकः हेतुः दुःख–त्रय–अभिघातकः। अनुश्रूयते, इति अनुश्रवः, तत्र भवः आनुश्रविकः। सः च आगमात् सिद्धः। यथा– Если изыскание должно быть сделано в […]