свитки

#Я не смогу представить весь перевод комментария Y на СК20 по причине трудоёмкости процедуры. Но заслуживающий внимания фрагмент, покрывающий более одной трети всего пояснения, я приведу. Особенность текста Y на […]

स्यात् एतत्– – प्रमाणेन कर्तव्यम् अर्थम् अवगम्य, चेतनः अहं चिकीर्षन् करोमि – इति कृति–चैतन्ययोः सामानाधिकरण्यम् अनुभव–सिद्धम्। तत् एतस्मिन् मते न अवकल्पते; चेतनस्य अकर्तृत्वात्, कर्तुः च अचैतन्यात्। Возможно следующее <возражение>: — […]

– यस्मात् अकर्ता पुरुषः, तत् कथम् अध्यवसायं करोति– «धर्मं करिष्यामि, अधर्मं न करिष्यामि» इति? अतः कर्ता भवति। न च कर्ता पुरुषः। एवम् उभयथा दोषः स्यात्। #यस्मात् не используется в придаточных […]

– ननु च यदि अचेतनम् अव्यक्तं, कथं देह–इन्द्रिय–संज्ञम् अधिष्ठानं धर्म–अधर्म–आदिषु प्रवर्तते; तस्य अचेतनत्वात्? — Ну конечно. Если Навь бессознательна, как так называемое тело-и-чувства осуществляет управление в части той же нравственности […]

अत्र आह– – यदि अकर्ता पुरुषः, अध्यवसायं तर्हि किं करोति– «धर्मं करिष्यामि, अधर्मं च» इति? यदि गुणाः अध्यवसायं कुर्वन्ति, तर्हि तेषां सचेतनत्वं स्यात्। अमीषां च अचेतनत्वम् एव प्राक् उपन्यस्तम्। अथ […]

अत्र आह– – यदि अकर्ता पुरुषः, अध्यवसायं तर्हि किं करोति– «धर्मं करिष्यामि», «अधर्मं करिष्यामि» इति? यदि गुणाः अध्यवसायं कुर्वन्ति, तत् स्व(स)चेतनाः इति (स्युः?)। अचेतनाः च गुणाः, इति प्राक् उक्तम्। अथ […]

Коль скоро бесноватые проявили активность на совершенно конкретном тексте, я расценил это как знак выложить всё по теме реального соотношения Пуруши и Пракр̥ти. Сначала будут доктринальные комментарии, а затем — […]

मैत्री–आदिषु बलानि [При фиксации] на дружелюбии и пр. [обретаются] силы. मैत्री, करुणा, मुदिता – इति तिस्रः भावनाः। तत्र भूतेषु सुखितेषु मैत्रीं भावयित्वा, मैत्री–बलं लभते। दुःखितेषु करुणां भावयित्वा, करुणा–बलं लभते। पुण्य–शीलेषु […]

– यदा योगी युगपद्–भोग–अर्थे बहून् कायान् निर्ममीते, तदा तेषु कस्मात् चित्तानि भवन्ति? इति अतः आह– — Когда ради одновременного опыта йогин сотворяет многие тела, тогда откуда в них бывают интеллекты? […]

अधुना प्रसङ्गात् विपाक–आशय–अभिव्यक्तेः कर्म–अभिव्यक्ति–निदानत्वम् अभिधातुम् आह– Теперь, чтобы обозначить по случаю причинную обусловленность актуализации приложения воздаяния актуализацией кармы, <автор> говорит: 4:8 ततः तद्–विपाक–अनुगुणानाम् एव अभिव्यक्तिः वासनानाम्॥ В результате неё (кармы) […]