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यदि 1[एवं] 2+[इदं]б* पुरुषस्य {पुरुष्स्य}ж भोग–संपादनम् +2[तत्]б* एव प्रयोजनं {प्रोयो॰}ж, 1[तदा] 2[तदानीं]б* संपादिते {स्म्पा॰}ж तस्मिन् 1[तस्मिन्]а 2[तत्] निष्प्रयोजनं विरत–व्यापारं स्यात्। तस्मिन् च परिणाम–शून्ये शुद्धत्वात् सर्वे द्रष्टारः बन्ध–रहिताः स्युः। ततः च […]

सः एव भोक्ता, इति आह– ॥ [सः]б* तद्–अर्थः एव दृश्यस्य आत्मा दृश्यस्य प्राक्–उक्त–लक्षणस्य [यः]ж आत्मा यत् स्वरूपं, [सः]-ж तद्–अर्थः [एव]ж। तस्य 1[पुरुषस्य] 2[पुरुष–अर्थ–]жभोक्तृत्व–संपादनं नाम स्व–अर्थ–परिहारेण प्रयोजनम् {प्रोयो॰}ж। न हि प्रधानं […]

एवं हेयत्वेन दृश्यस्य प्रथमं ज्ञातव्यत्वात्, तत् अवस्था–सहितं व्याख्याय, उपादेयं द्रष्टारं 1[व्याकर्तुम्] 2[व्याख्यातुम्]г 3[वक्तुम्]б* आह– ॥ द्रष्टा दृशि–मात्रः शुद्धः अपि प्रत्यय–अनुपश्यः द्रष्टा= पुरुषः। दृशि–मात्रः= 1[चेतना–मात्रः] 2[चेतन–मात्रः]аб* {॰मात्रम्}ж। मात्र–ग्रहणं 1[धर्म–धर्मि]где 2[धर्मि–धर्म]абв–निरास–अर्थम्। केचित् […]

«द्रष्टृ–दृश्ययोः संयोगः» इति उक्तम्। तत्र 1[दृश्यस्य स्वरूपं] 2[दृश्य–स्वरूपं]г*е, कार्यं, प्रयोजनं च आह– ॥ प्रकाश–क्रिया–स्थिति–शीलं भूत–इन्द्रिय–आत्मकं भोग–अपवर्ग–अर्थं दृश्यम् प्रकाशः= सत्त्वस्य धर्मः। क्रिया= प्रवृत्ति–रूपा रजसः। स्थितिः नियम–रूपा तमसः। ताः प्रकाश–क्रिया–स्थितयः शीलं (=स्वाभाविकं […]

स–उपद्रव–विक्षेप–प्रतिषेध–अर्थम् उपाय–अन्तरम् आह– В целях отмены отвлекающих факторов вместе с сопровождающим их бардаком स–उपद्रव–विक्षेप–प्रतिषेध–अर्थम् автор приводит आह ещё одну психопрактику उपाय–अन्तरम्– ॥ तद्–प्रतिषेध–अर्थम् एक–तत्त्व–अभ्यासः तेषां विक्षेपाणां प्रतिषेध–अर्थम् एकस्मिन् कस्मिंश्चित् अभिमते […]

– अथ के अन्तरायाः? – Тогда अथ кто такие के препятствия अन्तरायाः? В предыдущем пакете сутр было указано, что памятование о Господе приводит к устранению препятствий на пути отрешения. – […]

तस्य अपि समाधि–अन्तर–अपेक्षया बहिर्–अङ्गत्वम् आह– Говорится, что आह даже अपि у этой [троицы] तस्य по отношению к другому сосредоточению समाधि–अन्तर–अपेक्षया вторичность (внешний характер) बहिर्–अङ्गत्वम्– ॥ तत् अपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य निर्बीजस्य […]

– साधन–पादे योग–अङ्गानि अष्टौ उद्दिश्य, पञ्चानां लक्षणं विधाय त्रयाणां कथं न कृतम्? – В Четверти Средств осуществления साधन–पादे были перечислены उद्दिश्य восемь अष्टौ вспомогательных элементов отрешения योग–अङ्गानि। Пяти पञ्चानां дано […]

तस्य फलम् आह– Оглашается आह её तस्य плод फलम्– ॥ तद्–जयात् प्रज्ञा–आलोकः तस्य संयमस्य जयात् अभ्यासेन सात्म्य–उत्पादनात् प्रज्ञायाः (=[1[ध्यातव्य–]4* 2[ज्ञातव्य–]4*]विवेक–1[ख्यातेः] 2[[स्व]4*रूपायाः]4*) आलोकः (=1[प्रसवः] 2[विकासः]4*) भवति। प्रज्ञा ज्ञेयं सम्यक् अवभासयति, इति अर्थः॥ […]

Первые три сутры я выпустил, ибо там слишком всё серьёзно получилось. Даже под пароль. Остальную часть Третьей Четверти, посвящённой йогическим чудесам, мы почитаем выборочно, поскольку к вашей реалии это не […]