наука

॥ त्रयः रोगाः इति– 1निज–2आगन्तु–3मानसाः। ॥ तत्र ॥ (1) निजः = शारीर–दोष–समुत्थः, ॥ (2) आगन्तुः = भूत–विष–वायु–अग्नि–संप्रहार–आदि–समुत्थः, ॥ (3) मानसः = पुनः इष्टस्य अलाभात् , लाभात् च अनिष्टस्य उपजायते॥ Три […]

॥ त्रिविधम् औषधम् इति– ॥ दैव–व्यपाश्रयं, युक्ति–व्यपाश्रयं, सत्त्व–अवजयः च। ॥ तत्र ॥ दैव–व्यप–आश्रयं मन्त्र–ओषधि–मणि–मङ्गल–बलि–उपहार–होम–नियम–प्रायश्चित्त–उपवास–स्वस्त्ययन–प्रणिपात–गमन–आदि, ॥ युक्ति–व्यप–आश्रयं पुनः आहार–औषध–द्रव्याणां योजना, ॥ सत्त्व–अवजयः पुनः अहितेभ्यः अर्थेभ्यः मनो–निग्रहः॥ Три уровня врачевания это: (1) духовное, […]

५० ॥ त्रिविधा भिषजः इति। ॥ भिषक्–छद्म–चराः सन्ति, सन्ति एके सिद्ध–साधिताः, । ॥ सन्ति वैद्य–गुणैः युक्ताः = त्रिविधा भिषजः भुवि ॥ Три вида врачевателей (1) Есть [просто] живущие под вывеской […]

Внешний человек, человек плотский, не имеющий опыта внутренней жизни, обо всём судит поверхностно, часто по принципу «чем больше, тем лучше». Современная наука, являясь наукой безбожников, задала тон на чрезмерность и […]

[Это давно написанный текст, который я почему-то нигде не выставил] Задайте себе вопрос: «Сложно ли выучить санскрит?» А затем закройте глаза и прислушайтесь к хороводу мыслей, роящихся в голове. Как […]

06.10.2014 Давайте начистоту: у желающего самостоятельно освоить санскрит как живой язык нет для этого никаких инструментов. Судите сами. Все доступные грамматики – это описания мёртвого языка для языковедов, то есть […]

534 зн. कश्चन महाराजः आसीत्। तस्य प्रासादे कश्चन वानरः आसीत्। सः वानरः महाराजस्य अतीव विश्वास–पात्रम् अनुचरः। अतः राज–भवने सर्वत्र अपि तस्य प्रवेशः अनुमतः आसीत्। एकदा महाराजः अन्तःपुरे निद्रां कुर्वन् आसीत्। […]

1834 зн. कस्मिंश्चित् वने मदोत्कटः नाम सिंहः वसति स्म। गजः, शृगालः, काकः च तस्य अनुचराः आसन्। एकदा क्रथनकः नाम उष्ट्रः तत् वनम् आगतवान्। तं दृष्ट्वा, सिंहस्य अनुचराः उक्तवन्तः– – प्रभो! […]

1657 зн. कस्मिंश्चित् नगरे कश्चन चोरः आसीत्। सः चौर्ये अतीव निपुणः। एकदा चत्वारः पण्डिताः तत् नगरम् आगतवन्तः। पण्डितानां सविधे अधिकं धनम् आसीत्। «तत् धनम् अपहरणीयम्», इति चोरः चिन्तितवान्। अतः सः […]